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'पुलिस का सिपाही' : ...क्योंकि वह अपने परिवार को भूल आपको ही अपना परिवार मानता है?

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राजस्थान पुलिस के आईपीएस अधिकारी एवं राजधानी जयपुर में स्टेट क्राइम रिकार्ड ब्यूरो में पुलिस अधीक्षक पद पर तैनात पंकज चौधरी ने पुलिस के जवानों का दर्द साझा किया है। अपने लेख में चौधरी ने लिखा है कि किस तरह से पुलिस के एक जवान को अपने एवं अपने परिवार के साथ समझौता करना पड़ता है। जबकि पुलिस का वही जवान लगभग हर हुनर में माहिर होता है। चाहे बात किसी परिस्थिति को संभालने की हो या फिर किसी की सुरक्षा में तैनाती पर अलर्ट रहने की, हर क्षेत्र में पुलिस का ये जवान खुद को न सिर्फ बेहतर साबित करता है, बल्कि अपने ड्यूटी को भलीभांती निभाता भी है। 

इन सबके बावजूद होली, दिवाली, ईद, क्रिसमस या फिर किसी और त्यौहार पर, जब पूरे देश के लोग अपने परिवार वालों के साथ खुशियां मना रहे होते हैं, तब पुलिस के उसी जवान के लिए त्यौहार के कोई मायने नहीं होते, बल्कि लोगों की सुरक्षा और स्थितियों पर नजर बनाए रखने के लिए उसकी तैनाती होती है। इस पर भी पुलिस का ये जवान अपने और अपने परिवार को भूल लोगों को ही अपना परिवार मानकर उनकी सुरक्षा में हंसता हुआ तैनात रहता है। और तो और, किसी अनहोनी की स्थिति में उनका हमदर्द बनकर स्थितियों पर काबू भी पाता है।
 

सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर पुलिस के जवान की पीड़ा को जाहिर करते हुए आईपीएस अधिकारी पंकज चौधरी ने लिखा कि, "सम्पूर्ण राज्य की यातायात व्यवस्था, राज्य के प्रत्येक थाने/कार्यालय में कम्प्यूटर संचालन, तकनीकी कॉल विश्लेषण, ड्रोन संचालन में निपूणता, हथियारों का बारीकी से ज्ञान, सभी तरह के व्हीकल का ज्ञान, महत्वपूर्ण एवं बारीकी के साथ IPC व CRPC का किताबी एंव व्यवहारिक ज्ञान, परेड में पारंगत एवं दक्षता, सहनशीलता और संजीदगी के साथ पब्लिक डीलिंग, कानून व्यवस्था, वीवीआईपी ड्यूटी, अपराधियों की धड़पकड़, कोर्ट पेशी, सम्मन तामील, शाम एवं रात्रि गश्त, उच्चाधिकारियों के आदेशों की अक्षरश: पालना यदि इनमें कुछ आदेश विधिक अथवा नैतिक रुप से गलत भी हो।"

"ये सब अपना घर परिवार, त्यौहार एंव अन्य पारिवारिक जरुरी काम छोड़कर चुपचाप बिना कुछ बोले कार्य करने वाले तथा छुट्टियां, जिनके लिए उच्च अधिकारियों से प्रायः जद्दोजहद तथा कृपा हो तो छुट्टी मिल जाती है। इनको आज भी प्रायः प्रोत्साहन की बजाय दंड के आधार पर नियंत्रित करने का नकारात्मक प्रयास होता है। आज भी ऐसे लोग अकुशल श्रेणी में आते हैं। आज़ाद भारत मे अपने वाजिब हक़ व समस्या के लिए बोले जाने तक कि काफी हद तक पाबंदी है।" 

"जी हां, मैं पुलिस विभाग के 94% का बैसिक प्रतिनिधित्व करने वाले सिपाही/कांस्टेबल नामक प्रजाति की ही बात कर रहा हूं। ये बात दीगर है कि इसका 90% प्रतिनिधित्व सहज, सक्षम काम करने के जज़्बे के साथ पुलिस में आता है, शेष 10% निहायत भ्रष्ट और आपराधिक लक्षणों से युक्त होते हैं, जो शनै:शनै: बाकी बड़ी तादात को ख़राब करते रहते हैं। सिपाही की समग्र मज़बूती जो नैतिक, सामाजिक मूल्यों आर्थिक आधार एंव भावनात्मक रुप से हो। इनको प्रोत्साहन मैरिट के अनुसार, कार्य के अनुसार समयानुसार नियमित होती रहनी चाहिए।
— जयहिदं जयभारत जयसविंधान जयजवान"
 

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